जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
वार्षिक संगीतमाला 2024 के 25 बेहतरीन गीतों की फेरहिस्त में आज बारी है उस गीत की जिसे संगीतबद्ध किया एक बार फिर से संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर ने, लिखा भी पिछले गीत की तरह अमिताभ भट्टाचार्य ने पर आवाज़ (वो जो इस गीतमाला में पहली बार सुनाई देगी) है विशाल मिश्रा की। यह गीत है फिल्म स्त्री 2 का और यहां बात हो रही है खूबसूरती की।
हिंदी फिल्म जगत में नायिका की खूबसूरती पर तमाम गीत लिखे गए हैं। हर गीत में स्त्री की सुंदरता के बारे में नए नए विचार..नई-नई काव्यमय कल्पनाएं।
1968 में इन्दीवर ने फिल्म सरस्वतीचंद के गीतों के लिए बेहद प्यारे शब्द रचे थे। शुद्ध हिंदी में वर्णित उनका सौदर्य बोध सुनते ही बनता था। क्या मुखड़ा था ...चंदन सा बदन, चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना...मुझे दोष ना देना जगवालों, हो जाऊँ अगर मैं दीवाना.
इस गीत के अंतरे भी सौंदर्य प्रतिमानों से भरे पड़े थे । मसलन पहला अंतरा कुछ यूं था। ये काम कमान भंवे तेरी, पलकों के किनारे कजरारे...माथे पर सिंदूरी सूरज, होंठों पे दहकते अंगारे....साया भी जो तेरा पड़ जाए....आबाद हो दिल का वीराना। लगभग सत्तर सालों बाद भी ये गीत कानों में वैसी ही मिसरी घोल देता है।
नब्बे के दशक की शुरुआत में 1942 A Love Story फिल्म में जावेद अख्तर साहब का वह गीत आपको जरूर याद होगा जिसमें उन्होंने एक लड़की की खूबसूरती को इतने सारे बिंबों में बांधा था कि कहना ही क्या। वह गीत था एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा। उस गीत मैं एक कन्या की तुलना एक खिलते गुलाब, शायर के ख़्वाब, उजली किरण, वन में हिरण, चांदनी रात, सुबह का रूप, सर्दी की धूप जैसे 21 रूपकों से की गई थी। गाना सुनते हुए उस वक्त दिल करता था कि रूपकों का ये सिलसिला चलता रहे।
वैसे खूबसूरत शब्द को लेकर नीलेश मिश्रा ने फिर 2005 में फिल्म रोग के लिए लिखा कि खूबसूरत है वो इतना सहा नहीं जाता..कैसे हम ख़ुद को रोक लें रहा नहीं जाता....चांद में दाग हैं ये जानते हैं हम लेकिन....रात भर देखे बिना उसको रहा नहीं जाता
एम एम कीरावनी के संगीत और उदित नारायण की अदायगी ने तब इस गीत को खासी लोकप्रियता दिलवाई थी। पिछले साल अमिताभ भट्टाचार्य ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चौदहवीं पायदान के इस गीत के लिए क्या खूब लिखा कि
धूप भी तेरे रूप के सोने पे, कुर्बान हुई है तेरी रंगत पे खुद, होली की रुत हैरान हुई है तुझको चलते देखा, तब हिरणों ने सीखा चलना तुझे ही सुनके कोयल को, सुर की पहचान हुई है तुझसे दिल लगाए जो, उर्दू ना भी आए तो शख़्स वो शायरी करने लगता है कि कोई इतना खूबसूरत....कैसे हो सकता है?
अब कोयल और हिरण तो बेजुबान ठहरे वर्ना अमिताभ पर मानहानि का मुकदमा जरूर दायर करते। वैसे मजाक एक तरफ अमिताभ के लिखे बोलों में एक नयापन तो है ही जो सुनने में अच्छा लगता है।
सचिन जिगर यहां संगीत संयोजन में एक पाश्चात्य वातावरण रचते हैं जिसमें थिरकने की गुंजाइश रह सके हालांकि फिल्म की कहानी से इसका कोई लेना देना नहीं है। दरअसल ये गीत फिल्म के मूल कथानक के समाप्त होने के बाद आता है जहां वरुण धवन अतिथि कलाकार के रूप में पहली बार अपनी शक्ल दिखाते हैं। आजकल फिल्मी गीतों के बीच कोरस का प्रचलन बढ़ गया है। सचिन जिगर भी इसी शैली का यहां सफल अनुसरण करते दिखते हैं।
रही गायिकी की बात तो विशाल मिश्रा का गाने का अपना एक अलग ही अंदाज है। वह हर गाना बड़ा डूब कर गाते हैं। युवाओं का उनका ये तरीका भाता भी है। कबीर सिंह, एनिमल और हाल फिलहाल में सय्यारा में उनके गाए गीत काफी लोकप्रिय हुए हैं। ये अंदाज़ रूमानी गीतों पर फबता भी है पर बार बार वही तरीका अपनाने से एक एकरूपता भी आती है जिससे विशाल को सावधान रहना होगा।
तो आइए सुनते है ये गीत जिसे फिल्माया गया है राज कुमार राव, वरुण धवन और श्रद्धा कपूर पर
खूबसूरती पर तेरी, खुद को मैंने कुर्बान किया मुस्कुरा के देखा तूने, दीवाने पर एहसान किया खूबसूरती पर तेरी, खुद को मैंने कुर्बान किया मुस्कुरा के देखा तूने, दीवाने पर एहसान किया कि कोई इतना खूबसूरत, कोई इतना खूबसूरत कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है?
जो देखे एक बार को, पलट के बार-बार वो खुदा जाने, क्यों तुझे देखने लगता है सच बोलूं ईमान से, ख़बर है आसमान से हैरत में चांद भी तुझको तकता है कि कोई इतना खूबसूरत....कैसे हो सकता है?
चलते चलते तो मैं बस आदिल फ़ारूक़ी साहब का ये शेर अर्ज करना चाहूंगा कि
वार्षिक संगीतमाला की 15वें पायदान पर विराजमान इस अगले रूमानी गीत को लिखा है अमिताभ भट्टाचार्य ने। Dev D और आमिर जैसी फिल्मों से अपना लगभग दो दशकों का फिल्मी सफ़र तय करने वाले अमिताभ आज के युग के शैलेन्द्र कहे जा सकते हैं। सहज बोलों से जादू पैदा करना उनकी फितरत रही है। हालांकि वो फिल्म उद्योग में एक गीतकार नहीं बल्कि एक गायक बनने आए थे।
गायक के रूप में वो अपने आप को स्थापित तो नहीं कर पाए पर उसी संघर्ष के दौरान मिले गीत लिखने के मौकों से उनके मन में ये विश्वास जगा कि वो एक सफल गीतकार बन सकते हैं। शुरुआती दिनों में गायिकी का सपना उनके मन में इतना जोर मारता था कि वो गीत लिखते वक्त अपना नाम इंद्रनील रख लेते थे ताकि लोग उन्हें सिर्फ बतौर गायक जानें। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया के इस गीत "तुम से..." को भी उन्होंने इंद्रनील के नाम से लिखा है। पर आज जब वो लोकप्रियता की ऊंचाइयों पर हैं तो उनके द्वारा इस नाम को अपनाने का कारण कुछ दूसरा है।
उन्होंने ऐसा फैसला किया है कि जिस फिल्म में सारे गीत उनसे नहीं लिखवाए जाएंगे उसमें वो अपना असली नाम नहीं देंगे।
अमूमन मैं ज्यादा फिल्में नहीं देखता पर संयोगवश ये ओटीटी पर देख ली थी। शाहिद कपूर यहां एक ऐसी कन्या के प्यार में पड़े है जो कि एक सामान्य मनुष्य नहीं बल्कि रोबोट है। हालांकि इस गीत से शायद ही आपको इस फिल्म की अलग सी प्रेम कथा का अनुमान मिलेगा।
इसका एक कारण ये भी है कि संगीतकार सचिन जिगर ने अमिताभ से ये गीत फिल्म बनने के पहले ही लिखा लिया था। उन्होंने इस गीत को गवाया युवा गायक वरुण जैन से जिनकी आवाज़ से इस गीत माला में शामिल पिछले गीत से आप रूबरू हो चुके हैं। अलीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले वरुण अपनी गायिकी में बहुत कुछ अरिजीत की याद दिला जाते हैं। जिस तरह से उनके गाए चुनिंदा गीत फिल्मों में हिट हो रहे हैं उससे स्पष्ट है कि लोग उनकी आवाज़ को पसंद कर रहे हैं। हालांकि लंबे समय तक संगीतप्रेमी उन्हें याद रखें उसके लिए ये जरूरी होगा कि वो अपना एक अंदाज़ विकसित करें।
वरुण से जब बचपन में पूछा जाता था कि बड़े होकर क्या बनोगे तो उनका एक ही जवाब होता था कि मैं सिंगर बनेगा हालांकि उसे छोटी उम्र में उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि सिंगर बनना का मतलब क्या है और सिंगर कैसे बना जाता है।
वरुण बचपन में पोगो चैनल काफी देखा करते थे और उनमें जो कार्यक्रम आते थे जैसे नोडी का किरदार उन्हें बहुत पसंद था तो नोडी जो भी गाता था वह उसके साथ गाते थे। ऐसे तो घर में संगीत का कोई ऐसा माहौल नहीं था पर यह जरूर था कि वरुण के दादाजी गाते और लिखते भी थे। उसका असर वरुण पर जरूर पड़ा। वरुण को फिल्मों में गाने का मौका सबसे पहले सचिन जिगर ने ही दिया था और इस गीत को भी गाते हुए उनका ब्रीफ यही था कि इसके खूबसूरत बोलों को जितना दिल लगा कर गा सकते हो उतना कोशिश करो और वरुण ने क्या खूबसूरत कोशिश की।
अलग तुझमें असर कुछ है कि दिखता नहीं मगर कुछ है फ़िदा हूँ मैं तो एक नज़र, बस एक नज़र बस एक नज़र तक के लगे भी तो ये और किधर, अब और किधर दिल संग तेरे लग के
सही वो भी लगे मुझको ग़लत तुझमें अगर कुछ है अलग तुझमें असर कुछ है
तुम से किरण धूप की तुम से सियाह रात है तुम बिन मैं बिन बात का तुम हो तभी कुछ बात है
तेरी ये सोहबत हुई मुझे नसीब है जब से थोड़ा तो बेहतर, ख़ुदा क़सम, हुआ हूँ मैं मुझसे है तू ही तू तसव्वुर में, है तू ही तू तसव्वुर में कहाँ अपनी ख़बर कुछ है, अलग तुझमें असर कुछ है, हो तुम से किरण धूप की...तुम हो तभी कुछ बात है
करिश्मे सच में होते हैं इस बात की तू मिसाल है सवालों का जवाब है या ख़ुद ही तू एक सवाल है? जितनी भी तारीफ़ करूँ मैं , वो कम है क़सम से, तू कमाल है, तू कमाल है
सचिन जिगर की रची इस गीत की मेलोडी मन को सुकून देती है खासकर तुम से किरण धूप की वाला हिस्सा तो बड़ा प्यारा लगता है। तो आइए आप भी सुनिए इस गीत को अगर आपने न सुना हो इसे अब तक
वार्षिक संगीतमाला की अगली पायदान पर गाना वो जिसका एक हिस्सा कव्वाली है तो दूसरा हिस्सा ठुमरी की शक्ल में है और इन हिस्सों के बीच में इश्क़ से इबादत का सफ़र तय करता एक रूमानी गीत भी है। ये गीत है "इश्क़ है ये इश्क़ है...."। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि OTT पर Mismatched Season III में सम्मिलित ये गीत Spotify के वॉयरल गीतों की सूची में कई दिनों तक अव्वल नंबर पर बना रहा था। ज़ाहिर है Gen Z ने इस गीत को हाथों हाथ लिया था।
राजशेखर ने इस गीत को लिखा पहले और फिर अनुराग ने इसकी धुन बनाई। इसी सीरीज़ के पिछले सत्र में उन्होंने एक नज़्म ऐसे क्यूँ लिखी थी जो काफी सराही गई थी। राजशेखर की इस बात पर मैं भी यकीं करता हूँ कि कव्वाली या ग़ज़ल का युग चला गया ये गलत सोच है। दरअसल बहुत निर्माता निर्देशक भ्रम पाल लेते हैं कि ऐसे जोनर नहीं चलेंगे पर सच ये है कि अगर कोई गीत कथ्य के अनुरूप पूरी ईमानदारी से बनाया जाता है तो नव युवा से प्रौढ़ जनता के बीच श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग उसे मन से स्वीकार करता है।
जहाँ तक मेरी पसंद का सवाल है तो मुझे इस गीत का सबसे प्यारा हिस्सा लगी राग नंद पर आधारित मधुबंती बागची की गायी ठुमरी जिसे अलग से ना जाने मैं कितनी ही बार सुन चुका हूँ। साथ ही इस गीत की दूसरी खासियत रही इश्क़ को सूफियत के रंग में रँगने वाले राजशेखर के लिखे बेहतरीन बोल। जब भी मैं किसी फिल्म में बतौर गीतकार राजशेखर का नाम देखता हूँ तो ये आशा बँध जाती है कि फिल्म के गीतों में कविता की एक धारा बहती जरूर दिखाई देगी। चाहे वो मीरा का भक्ति राग हो या सूफी संतो की वाणी, इश्क़ के आसमानी सफ़र की अंतिम मंजिल एक ही है और इसीलिए राजशेखर कया खूब लिखते हैं...
बरसी है मुझ पे मेहर आसमानी, मोहब्बत का देखो असर आसमानी
पैरों के नीचे ज़मीं उड़ रही है, है इश्क़ में हर सफ़र आसमानी
गीत की शुरुआत कव्वाली से होती है जिसकी शब्द रचना जानदार है। पर राग देश पर आधारित मुखड़े में संगीतकार अनुराग सैकिया की धुन को सुनकर एक डेजा वू का अहसास होता है मानो वो उतार चढाव पहले भी किसी गीत में सुने से हों। कव्वाली में रोमी की गायिकी में सुकून कम शोर ज्यादा सुनाई देता है पर सुकून की इस कमी को वरुण जैन की मखमली आवाज़ और मधुबंती बागची की ठुमरी पूरा कर देती है। राग नंद या नंद कल्याण से मेरा प्रेम तबका है जब मैंने इस पर आधारित एक ठुमरी अज हूँ न आए श्याम, बहुत दिन बीते सुनी थी। मधुबंती की आवाज़ एक अलग ही बुनावट लिए हुए है और उसमें इस बंदिश "मोपे ये करम भी कीजे...लागे नहीं तुम बिन जियरा...ऐसी बेखुदी ही दीजे ...मोपे ये करम भी कीजे" सुनना मन को प्रेम और सुकून से भर देता है।
तो चलिए पूरे गीत को सुनने से पहले ये टुकड़ा आपको सुनवाता चलूँ
देखो तो क्या ही बात है, कमबख्त इस जहां में ये इश्क़ है जिसने इसे रहने के काबिल कर दिया
रौशनी ही रौशनी है चार-सू जो चार-सू
इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है इश्क़ है
जो छुपा है हर नज़र में हर तरफ जो रूबरू
इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है इश्क़ है
तुमसे मिले तो कुछ गुनगुनी सी होने लगी है सर्दियां
तुमसे मिले तो देखो शहर में खिलने लगी हैं वादियां
साया मेरा है तू और मैं तेरा
तू दिखे या ना दिखे तू तेरी खुशबू कूबकू
इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है इश्क़ है
कोई कहता इश्क़ हमें आबाद करता है
कोई कहता इश्क़ हमें बर्बाद करता है
जेहन की तंग दीवारों से उठकर
मैं कहता हूं इश्क़ हमें आज़ाद करता है
मोपे ये करम भी कीजे
मोपे ये करम भी कीजे
लागे नहीं तुम बिन जियरा
ऐसी बेखुदी ही दीजे ़़मोपे ये करम भी कीजे
हाँ.. साया मेरा हो तू और मैं तेरा
ये ही मेरी वहशतें हैं ये ही मेरी जुस्तजू
इश्क़ है ये इश्क़ है इश्क़ है इश्क़ है
बरसी है मुझ पे मेहर आसमानी, मोहब्बत का देखो असर आसमानी
पैरों के नीचे ज़मीं उड़ रही है, है इश्क़ में हर सफ़र आसमानी
तुमसे मिले तो बैठे बिठाए, छूने लगे हैं आसमां
तुमसे मिले तो छोटा सा किस्सा, बनने को है एक दास्तां
ये ही गीत का पूरा ऑडियो
मिसमैच्ड की कहानी किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ते युवाओं की है जिन्हें रिश्ते इसी इश्क़ की बुनियाद पर पल बढ़ तो कभी बिखर रहे हैं।
कुछ व्यक्तिगत कारणों से इस संगीतमाला पर एक लंबा ब्रेक लग गया था। आप सबको मैं 18 वीं पायदान के गीत वल्लो वल्लो पर छोड़ गया था। तो आज बारी है संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर बैठे गीत की चर्चा करने की। ये गीत है ओ सजनी रे... जिसे पिछले साल लोगों द्वारा खूब पसंद किया गया। आपको याद होगा कि गत साल आई फिल्मों में लापता लेडीज़ ने खासी धूम मचाई थी। मुझे भी ये फिल्म औसत से बेहतर ही लगी थी। कलाकारों का अभिनय जानदार था और बतौर दीपक, स्पर्श श्रीवास्तव का काम तो मुझे खासा प्रभावित कर गया था। फिल्म की सफलता में इसके संगीत की भी अहम भागीदारी थी।
इस फिल्म का संगीत निर्देशन किया था राम संपत ने। आमिर के साथ राम की सोहबत तलाश और सत्यमेव जयते के ज़माने की है। राम संपत इस गठजोड़ के बारे में अपने साक्षात्कारों में एक वाकया सुनाते हैं। जब उन्हें इस प्रोजेक्ट में लिया गया तो दुर्भाग्यवश मलेरिया के शिकार होकर वे अस्पताल में भर्ती हो गए। आमिर दुविधा में थे कि उन्हें रखें या नहीं। उन्होंने राम को फोन किया कि क्या आप इस प्रोजेक्ट को कर पाएँगे और तब राम ने उत्तर दिया कि I was born to do this project। फिर क्या था आमिर ने कहा कि अगर ऐसा है तो ये प्रोजेक्ट आप ही करेंगे। अस्पताल में रहते हुए ही राम संपत ने इस टीवी शो में प्रयुक्त गीत ओ री चिरैया की धुन तैयार की जो आज तक उसी चाव से सुनी जाती है।
राम संपत को हमेशा से ये मुगालता रहा है कि उन्हें अक्सर धीर गंभीर विषयों वाली फिल्मों को करने के मौके मिले। एक दो गीतों को छोड़ दें तो उनकी झोली में इतने दशकों के करियर में कोई रोमांटिक गीत शायद ही आया हो। इसीलिए जब ओ सजनी रे बनाने की बारी आई तो उन्होंने सोचा कि इसे बेहतर रूप कैसे दिया जाए। आख़िर दीपक का फूल से शादी के तुरंत बाद बिछड़ने के प्रसंग पर ही पूरी कहानी आधारित थी। दीपक के हृदय में फूल के यूँ गुम हो जाने की पीड़ा इस गाने में झलकानी थी। इस गीत के लिए सबसे बड़ा जोखिम लिया उन्होंने इंस्टाग्राम पर खड़ी बोली और ब्रज में लिखने वाले प्रशांत पांडे का गीतकार के रूप में चुनाव कर के जिनसे वो गीत के प्रीमियर के वक़्त पहली बार मिले। प्रशांत के इस गीत के लिए लिखे सहज बोल लोगों को बहुत जमे। मुझे इस गीत की वो पंक्ति सबसेअच्छी लगी जिसमें उन्होंने लिखा....कैसे घनेरे बदरा घिरे...तेरी कमी की बारिश लिए 🙂। वैसे पूरा गीत कुछ यूं है।
ओ सजनी रे
कैसे कटे दिन रात
कैसे हो तुझसे बात
तेरी याद सतावे रे
ओ सजनी रे...तेरी याद तेरी याद सतावे रे
कैसे घनेरे बदरा घिरे
तेरी कमी की बारिश के लिए
सैलाब जो मेरे सीने में है
कोई बताये ये कैसे थमे
तेरे बिना अब कैसे जियें
ओ सजनी रे...तेरी याद तेरी याद सतावे रे
गाँव की पृष्ठभूमि में बनी इस पटकथा के लिए विशुद्ध देशी या लोकसंगीत के बजाए राम संपत और निर्माता किरण राव ने देशी के साथ पश्चिमी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल कर गीत को एक ताज़ी शक़्ल देने की कोशिश की गई जो आज के दौर के नायक नायिका के अनुरूप लगे। मूलतः गिटार पर आधारित इस धुन में कोरा, उदू और गोनी जैसे विदेशी वाद्य यंत्रों का भी इस्तेमाल हुआ है।
सबसे पहले ये गीत राम संपत ने अपनी आवाज़ में रिकार्ड किया था और आमिर ने उसे OK भी कर दिया था पर राम ये गीत अरिजीत से गवाना चाहते थे। जब दो तीन हफ्तों के बाद अरिजीत ने रिकार्डिग भेजी तो राम ये देख के चकित हो गए कि अरिजीत ने उसी गीत को दस अलग अलग तरह से गाया था।
अगर आप सोच रहे हों कि ये कैसे संभव है तो उनके कुछ वर्सन के नाम सुन लीजिए ...ये किरण मैम की ब्रीफिंग के हिसाब से, ये आमिर सर के सुझाव पर , ये आपके जैसा, ये स्माइल के और ये बिना स्माइल के....😁।
राम संपत कहते हैं गायिकी के प्रति अरिजीत की ये प्रतिबद्धता उन्हें वो मुकाम दिला पाई है जिसके वो सच्चे हक़दार हैं। खैर राम ने जो वर्सन चुना वो बेहद सराहा गया तो एक बार और आप भी सुन लीजिए ये पूरा गीत
फिल्म संगीत हो , वेब सीरीज या फिर स्वतंत्र संगीत अमित त्रिवेदी अपनी रचनात्मकता श्रोताओं के सामने लाते ही रहे हैं। विगत कुछ सालों में Songs of Love, Songs of Trance, जादू सलोना जैसे स्वतंत्र संगीत से जुड़े एल्बम रचने के बाद 2024 के आखिरी महीनों में उनका नया एल्बम आया Azaad Collab.। इस एल्बम में उन्होंने कई ऐसे गायक गायिकाओं के साथ गीत के वीडियो बनाए जो अक्सर उनकी फिल्मों में बतौर पार्श्व गायक नज़र आते हैं। अमित का कहना था कि उन्होंने Play back singers को इस एल्बम के जरिए Play front करवाया यानी वो सिर्फ सुनाई ही नहीं बल्कि गीत के फिल्मांकन में दिखाई भी देंगे।
चौदह गीतों से सजे इसी एल्बम का एक गीत है वल्लो वल्लो जिसे मैने चुना है वार्षिक संगीतमाला की 18 वीं पायदान के लिए। इस गीत को गाया है नीति मोहन और असीस कौर ने। ये वही नीति मोहन हैं जिन्होने गुलज़ार के गीत जिया जिया रे ( जब तक है जान)से फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाई थी। उसके बाद सपना जहां और दिल उड़ जा रे में भी उन्होंने अपनी गायिकी से मुझे प्रभावित किया था। इस गीतमाला में भी उनका एक गीत प्रथम पाँच में अपनी जगह बनाता हुआ दिख रहा है।
असीस कौर ने तो वैसे बहुतेरे गाने गाए हैं पर मुझे उनका गाया वे कमलेया कमाल लगता हैं। हालांकि फिल्म में श्रेया वाला वर्सन ही इस्तेमाल हुआ। इस गीत को लिखने वाले हैं गीत सागर जो गाहे बगाहे फिल्मी गीतों में अपनी आवाज़ भी देते रहे है और एक रियलिटी शो X Factor के विजेता भी रह चुके हैं। जावेद अख़्तर साहब के शैदाई हैं और एक रेडियो जॉकी भी हैं। जाहिर है एक अच्छी आवाज़ के मालिक भी होंगे ही। हालांकि मुझे वो एक गायक की तुलना में गीतकार व रेडियो जॉकी के रूप में ज्यादा पसंद आए ।
वल्लो वल्लो एक तरह का अभिवादन है कश्मीरी शादी में दूल्हे के लिए। दरअसल ये युगल गीत में दोनों कश्मीरी लड़कियां ये सोच रही हैं कि उनका होने वाला हमसफ़र कैसा होगा? गीत सागर के लिए ये विषय नया था पर उन्होंने इस गीत को दो लड़कियों की बातचीत को उर्दू के शब्दों से इस तरह तराशा कि ये गीत एक अफ़साना सा ही बन गया।
मेरा दिलदार यार होगा कभी रूबरू मेरे दिल को भी प्यार होगा कभी हूबहू वो जिसकी हर अदा पे जाऊँगी क़ुर्बान मैं वो जिसका इश्क़ बनूँगी वो जिसकी जान मैं वो जिसके साथ फिरुँगी मैं सदा कूबकू कूबकू
उनकी लिखी कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाएं जो मुझे खास तौर पर पसंद आईं.. ध्यान रहे यहां बात होने वाले पतिदेव के व्यक्तित्व की हो रही है
वल्लो वल्लो महाराजो वल्लो वल्लो.... खुरदुरी आवाज़ में ओस की नमी जिसको देख देख चले साँस मद्धमी जिसका रोब देख के रास्ते खुले जिसके नैन देख के तड़पे चाँदनी
तड़पे चाँदनी तड़पे चाँदनी
मेरी हस्ती ज़रा चमके किसी जुगनू की तरह
मेरी साँसें सदा महकें नई खुशबू की तरह
किसी तितली की तरह खुश लगे ये जस्तजू जस्तजू
ओह वल्लो वल्लो,,,महजबीं हसीन दुल्हन से मिलो
वल्लो वल्लो महाराजो वल्लो वल्लो
ना जी ना अभी अहर्ताएं और भी हैं और ये तो और ज्यादा जरूरी हैं
किसी ज़ेवर की तरह साथ रखे याद मेरी
किसी बच्चे की तरह ज़िंदगी हो शाद मेरी
मेरे हँसने मेरे रोने से उसे फर्क पड़े
उसे पा कर के लगे ज़िंदगी दिलशाद मेरी
फरियाद मेरी ओ फरियाद मेरी
खुश रहे तू अज़ीज़ा आबाद मेरी
शगुन वाली रात आई, खुशियों के जज़्बात लाई रौनकें सब साथ लाई, देखो देखो देखो देखो
अमित त्रिवेदी का संगीत और वाद्य यंत्रों का चुनाव आपको कश्मीर की वादियों में ले जाता है। नीति मोहन और असीस कौर दोनों ही बेहतरीन गायिका हैं और इस गीत में उनकी आवाज और अभिनय दोनों में ही परफेक्ट ट्यूनिंग है। अगर बात कश्मीर की हो तो रबाब का इस्तेमाल तो गीत में होना ही था और उसके साथ बौज़ौकी भी है जिसे तापस रॉय ने हमेशा की तरह बखूबी बजाया है। गीत के बोल, गायिकी और संगीत की जुगलबंदी से ये गीत मन को एक खुशनुमा अहसास से भर देता है।
गायिकाओं , संगीतकार गीतकार की जोड़ी के साथ इस गीत के वीडियो में कुछ प्यारे बच्चे भी हैं जिनकी वज़ह से वो देखने लायक बन गया है। अमित त्रिवेदी ने भी अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि वो इस गीत से एक खास लगाव रखते हैं। इस गीत को देखिए कहीं आप भी मेरी तरह इसके अनुरागी बन जाएँ
देश में युद्ध के बादल थम चुके हैं। जब हमारे पराक्रमी सैनिक और सरहदों के पास रहने वाले देशवासी युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहे हों तो फिर दिल में गीत संगीत की बात तो उठती ही नहीं, बस एक ही भाव रहता है कि जल्द से जल्द देश का अहित चाहने वालों का नाश हो और हमारी सेना अपने लक्ष्य में सफल हों। यही वज़ह थी की वार्षिक संगीतमाला पर पिछले एक महीने से मैंने बीच में ही विराम लगा दिया था।
अब जबकि युद्ध के बादलों की जगह बारिश के बादलों ने ले ली है तो इस संगीतमाला को फिर से शुरु करते हुए लौटते हैं पिछले साल के बेहतरीन गीतों की इस शृंखलाकी उन्नीसवीं पायदान के इस गीत की तरफ जिसे लिखा स्वानंद किरकिरे ने, धुन बनाई राम संपत ने और गाया श्रेया घोषाल ने। फिल्म लापता लेडीज़ तो आपमें से बहुतों ने देखी होगी और ये गीत फिल्म के सुखद अंत के समय आता है जब जया अपने सपनों को पूरा करने के लिए एक नए सफ़र पर निकल पड़ती है। स्वानंद जया के मन को कुछ इन पंक्तियों में बाँधने की प्यारी कोशिश करते हैं।
धीमे-धीमे चले पुरवैया
बोले, "थाम तू मेरी बैयाँ"
संग चल मेरे, रोके क्यूँ जिया
हो,
धीमे-धीमे चले पुरवैया
रुत ये अनोखी सी आई, सजनिया बादल की डोली में लो बैठी रे बुँदनिया धरती से मिलने को निकली सावनिया सागर में घुलने को चली देखो नदिया, धीमे-धीमे चले पुरवैया...
एक ऐसे अनजान गाँव से जहाँ नियति के चक्र ने उसे अचानक ला खड़ा किया था, जया अपने सपनों का मुकाम तलाशने शहर की ओर जा रही है। गाँव नदी, शहर समंदर और बादल की वो बूँद अगर जया हो तो स्वानंद का लिखा ये अंतरा कितना सार्थक हो उठता है। नई उम्मीद का संचार करता गीत का दूसरा अंतरा भी उतना ही प्रभावी है।
नया सफ़र है, एक नया हौसला, बाँधा चिड़ियों ने नया घोंसला नई आशा का दीपक जला, चला सपनों का नया क़ाफ़िला
कल को करके सलाम, आँचल हवाओं का थाम देखो उड़ी एक धानी चुनरिया, हो, धीमे-धीमे चले पुरवैया...
संगीतकार राम संपत ने शांत करती गीत की धुन के साथ तार वाद्यों का न्यूनतम संयोजन रखा है। श्रेया घोषाल की आवाज़ के साथ बस आँख बंद कर इस गीत की भावनाओं को दिल में समेटिए। एक बहती धारा की कलकल ध्वनि के बगल में बैठकर दिल में जो आनंद का अनुभव होता है कुछ वैसा ही शायद इस गीत को सुनकर आप महसूस करें।
पृथ्वी गंधर्व को मैं पिछले कुछ सालों से एक ऐसे ग़ज़ल गायक के रूप में देखता आया था जो मुंबई कि छोटी बड़ी महफिलों में हारमोनियम लिए कभी ख़ुद तो कभी अपने साथी कलाकारों के साथ गाते गुनगुनाते नज़र आते थे। उनकी गायिकी में गुलाम अली, मेहदी हसन व हरिहरण का प्रभाव स्पष्ट ही दिखता है। मेहदी हसन के साथ तो उन्होंने वक़्त बिताया ही है आजकल भी गुलाम अली के साथ विदेशों में एक साथ मंच साझा करते रहे हैं।
पृथ्वी गंधर्व एक संगीत से जुड़े परिवार से आते हैं। दादा, पिता, बहन सब किसी न किसी वाद्य यंत्र में महारत रखते हैं। गायिकी में मां की रुचि थी पर ऐसे संगीतमय माहौल में शास्त्रीय संगीत और ग़ज़ल गायिकी सीखने के लिए पृथ्वी हरिहरण जी के पास पहुंचे और उनके पुत्र के साथ रियाज़ करते करते उनका विश्वास जीता।
इन्हीं महफिलों का असर था कि बंदिश बैंडिट्स के निर्देशक आनंद तिवारी और आकाशसेन गुप्ता को किसी ने पृथ्वी का नाम सुझाया। आनंद ने चार पाँच घंटे के संगीत सत्र में उनसे 16 बंदिशें गवाई पर मामला कुछ जमा नहीं। हालांकि संगीत के ये दौर चलते रहे। ऐसे ही एक सत्र में उनसे कुछ अपना स्वरचित सुनाने की फर्माइश हुई और तब जो गीत पृथ्वी गंधर्व के ज़ेहन में आया वो था निर्मोहिया जिसकी धुन उन्होंने पियानो पर कोविड काल में उज्जैन में घर बैठे रिकार्ड की थी।
पृथ्वी गंधर्व और सुवर्णा तिवारी
निर्मोहिया में शास्त्रीयता के साथ साथ कानों पर तुरंत चढ़ जाने का असर भी था। इसलिए इस वेब सीरीज के लिए तुरंत ही उनकी ये बंदिश चुन ली गई। राग यमन पर आधारित इस बंदिश में पृथ्वी गंधर्व का साथ दिया सुवर्णा तिवारी ने जो ख़ुद ही एक मँजी हुई शास्त्रीय गायिका हैं। सुवर्णा की गहरी और धारदार आवाज़ के साथ पृथ्वी गंधर्व की मुलायमित खूब सराही गयी। यूँ तो बंदिश बैंडिट्स में पृथ्वी ने कई गीतों में अपनी उपस्थिति गायक या संगीतकार के रूप में दर्ज की है पर निर्मोहिया की बात कुछ अलग है।
आजकल फ्यूजन के नाम पर सुकून देते हुए शास्त्रीय या उप शास्त्रीय संगीत में पश्चिमी वाद्यों का बढ़ता शोर अक्सर उस मूड का सत्यानाश कर देता है जिसकी गिरफ्त में हम हौले हौले आ रहे होते हैं। निर्मोहिया में प्रेम की विकलता है, सरगम के टुकड़े हैं, सारंगी, तबले और बाँसुरी की मधुर संगत है, पश्चिमी वाद्यों में ड्रम्स हैं जो कभी कभी अपनी झंकार सुना देते हैं और यही वजह है कि ये गीत वार्षिक संगीतमाला की बीसवीं पायदान पर अपनी जगह बना पाया है।
निरमोहिया, हरजाइया, बैरी जिया रे मोरा बैरी जिया बावरा मन तेरी लगन में डूब ना जाए तेरे नयन में आ भी जाओ ना सताओ आ भी जाओ ना सताओ कैसे मैं कहूँ सखी बातें काटे ना कटे वैरी रातें इक पलछिन ना छँट रही उनकी यादें हैं भोर तलक ना लग रही मेरी आँखें जोगन बन गयी मैं तो जोगिया
गीत के इन बोलों को लिखा है मैडी गिल ने। तो आइए सुनते हैं इस गीत को यहाँ
वार्षिक संगीतमाला की सीढ़ियों को चढ़ते हुए आज बारी है 21वें पायदान के गीत की जिसे गाया है अपनी आवाज़ में चंचलता का रस घोलते हुए श्रेया घोषाल ने। पुष्पा 2 फिल्म के इस couple song के नाम से मशहूर इस गीत की धुन बनाई है देवी श्री प्रसाद ने।
उत्तर भारतीय संगीत प्रेमियों के लिए देवी श्री प्रसाद भले ही अनजान हों पर तेलुगू फिल्म उद्योग में वो जाना पहचाना नाम हैं। शायद ही आपको पता हो कि उन्हें उनके प्रशंसक प्यार से DSP RockStar के नाम से बुलाते हैं। पच्चीस सालों के अपने लंबे कैरियर में नौ फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित DSP अपनी धमाकेदार धुनों के लिए जाने जाते हैं।
पुष्पा के प्रथम संस्करण में श्रीवल्ली और उ उ अन्टवा मावा से धूम मचाने वाले DSP पुष्पा 2 में भी अंगारों और किसिक जैसे गीतों को लेकर खासे चर्चित रहे। हाँ ये जरूर है कि पुष्पा के प्रथम संस्करण की तुलना में फिल्म के गीत उतना नहीं बजे ।
बहरहाल DSP ने गीतकार के रूप में एक बार फिर अपने जोड़ीदार रक़ीब आलम को लिया। रक़ीब उनकी पहली फिल्म देवी में भी उनके साथ रहे थे। पुष्पा के गीत लिखने के बाद निर्देशक सुकुमार उनसे इतने प्रभावित हुए कि पुष्पा 2 के भी सारे गीत उनकी ही झोली में गए। रक़ीब बहुभाषी गीतकार हैं। दक्षिण भारतीय भाषाओं में लिखने के आलावा वे स्लमडॉग मिलयनियर और गैंगस्टर जैसी फिल्मों के गीत लिख चुके हैं।
अंगारों का अम्बर सा..एक ऐसा गीत है जिसमें नायिका बाहर से कठोर छवि रखने वाले पति के अन्दर से मुलायम स्वभाव का बखान कर रही है। बड़ी ही सहज भाषा में एक घरेलू स्त्री अपने पति की जिन बातों पर नाज़ कर रही है वो कहने को तो मामूली हैं पर ऐसे ही पल रोज़ की आपाधापी में पति पत्नी के आपसी प्रेम को प्रगाढ़ करते रहते हैं अब चाहे वो कुर्ता ढूंढ कर देने की बात हो या गोद में सर रख कर सोने की।आंतरिक और ब्राह्य व्यक्तित्व में.अंतर स्पष्ट करने के लिए गीतकार द्वारा कुछ नए शब्दों का इस्तेमाल करना खास तौर पर सोहता है जब वो लिखते हैं
आग देखी ताब (चमक) देखी इसकी आँखों में सबने आब (पानी ) देखा ख्वाब देखा इसकी आंखों में हमने
अगर DSP के संगीत की बात करूँ तो सबसे पहले इस गीत को सुनते हुए आपका ध्यान ताल वाद्यों पर जायेगा जिसकी थाप पर नायक नायिका मस्ती में झूमते हैं।. मुखड़े के साथ पीछे बजते घुँघरू, अंतरों के बीच बजती शहनाई और दिलरुबा के छोटे मगर प्यारे टुकड़े संगीत में जान डालते हैं। गीत में शहनाई बजायी है बालेश ने और दिलरुबा पर उँगलियाँ हैं सरोजा जी की।
पत्थर है वो, मुझे रोक टोक कहते हैं लोग पर मोम सा है मेरा जानू नश्तर है वो यही दूर दूर गूंजे फितूर पर बादशाह है मेरा जानू
हो कड़वी है बोली, दिल है रंगोली इसमें पत्थर क्यों लोग देखते हैं मुझको तो दिखता है इसने कोई सनम अंगारों का अंबर सा लगता है मेरा सामी मेरी राहों में फूलों का रास्ता है मेरा सामी
आग देखी ताब देखी इसकी आँखों में सबने आब देखा ख्वाब देखा इसकी आंखों में हमने इसके मूँछों में बला के देखी है शान सबने पर इन्हीं मूँछों के पीछे देखी मुस्कान हमने
शेरों की अगर रफ़्तार हो इसकी रहती है उस पे सबकी नजर सो जाए जब सर गोद में रखकर इसकी थकन तो श्री वल्ली को हो खबर अंगारों का अंबर सा लगता है मेरा सामी मेरी राहों में फूलों का रास्ता है मेरा सामी हो
मँहगे मँहगे बाँटे तोहफे ये है इसकी नवाबी मुझसे डर डर के ये मांगे एक झप्पी गुलाबी मसला कितना भी हो मुश्किल, चुटकियों में कर ले हल कुर्ता इसका ना मिले तो मांगे मुझसे ये पागल घर से अलग बाहर की दुनिया झुकती रहे इसके आगे पर जब जब घर से निकले माथे पे तिलक मुझसे आके मांगे अंगारों का अंबर सा लगता है मेरा सामी ऐसा घरवाला मिल जाए तो घर वाले महारानी
गीत और संगीत अपनी जगह पर अगर इस गीत को श्रेया की चुलबुली आवाज का साथ नहीं मिला होता तो ये गीत इस मुकाम तक पहुंच नहीं पाता । दरअसल हर एक मँजा हुआ गायक अभिनय कला में पारंगत होता है पर फर्क बस इतना है की उसे ये अभिनय परदे के पीछे रहकर अपनी आवाज़ के जरिये बाहर लाना पड़ता है।
गीत और संगीत अपनी जगह पर अगर इस गीत को श्रेया की चुलबुली आवाज का साथ नहीं मिला होता तो ये गीत इस मुकाम तक पहुंच नहीं पाता । दरअसल हर एक मँजा हुआ गायक अभिनय कला में पारंगत होता है पर फर्क बस इतना है की उसे ये अभिनय परदे के पीछे रहकर अपनी आवाज़ के जरिये बाहर लाना पड़ता है। अब इसी गीत में "सामे" बोलते समय श्रेया के लहजे की मस्ती और "नवाबी" बोलते समय आवाज़ की मदहोशी सुनते ही बनती है। कहीं कहीं ऊंचे सुरों में अपनी रेंज से भी ऊपर जा कर गाने की कोशिश भी श्रेया ने इस गीत में की है ।
वार्षिक संगीतमाला में पिछले साल के पच्चीस बेहतरीन गीतों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए चलते हैं 22वीं पायदान के गीत की तरफ जिसे यहाँ तक पहुँचाने में मुख्य भूमिका रही है संगीतकार जी वी प्रकाश कुमार व गीतकार सजीव सारथी की। ये गीत है पिछले साल आई और काफी सराही गयी युद्ध आधारित फिल्म आमरण (अमरन) का।
प्रकाश की वॉयलिन पर बजती मधुर स्वरलहरियाँ और एक नवयुगल के प्रेम को व्यक्त करते सजीव के मुलायम शब्द इस गीत को कई बार सुनने को मजबूर करते हैं।
हिन्दी ब्लागिंग के शुरुआती दौर के साथी कवि का एक बड़ी बैनर की फिल्म के गीतकार के रूप में अपना सिक्का जमाते हुए देखना अपने आप में एक बेहद खुशी का सबब था और वो भी तब जबकि सजीव को इस फिल्म के सारे गीतों को लिखने के लिए सिर्फ दो तीन दिनों का ही वक़्त मिला।
देवेंद्र, सजीव (बीच में) के साथ मैं (वर्ष 2007)
मूलतः तमिल में बनी इस फिल्म की हिंदी में प्रदर्शित करने का निर्णय अंतिम समय में लिया गया। वक़्त कम था और हिंदी वर्सन के लिए जब प्रकाश ने पहले साथ काम कर चुके सजीव का नाम सुझाया तो उन्हें फिल्म के गीत पहले हे सोनिये लिखने का अवसर मिला जो निर्देशक राजकुमार पेरियासामी को इतना पसंद आया कि उन्होंने सारे गीतों को लिखने का जिम्मा सजीव को दे दिया। तमिल से जब गीतों को हिंदी में लिखने की बारी आई तो सजीव ने शाब्दिक अनुवाद से परे हटके गीत की भावनाओं को पकड़ा और उन्हें अपने शब्द दिये। सजीव कहते हैं कि अगले चार दिनों में सारे गीत लिखे गए, संगीत का संयोजन हुआ और गीतों की अंतिम रिकार्डिग भी कर ली गई। बतौर सजीव
ये मेरे जीवन की सबसे यादगार चार रातें थीं और इन बेहतरीन धुनों पर काम करते हुए इतना आनंद मुझे पहले कभी नहीं आया। इस फिल्म को दिल्ली में जब सैनिकों को विशेष रूप से दिखाया गया तो बहुतों की रुलाई छूट गयी पर साथ ही फिल्म के गीतों पर दर्शकों की प्रतिक्रिया देखकर संगीतकार जी वी प्रकाश को कहना पड़ा कि हिंदी वर्सन के गीत संगीत तो लगता है तमिल की अपेक्षा ज्यादा बेहतर तरीके से उभर कर आए हैं।
सजीव और प्रकाश के गीत संगीत से सजा जो गीत मेरी इस गीतमाला का हिस्सा बना है वो है मन रे मन रे। दो लोगों के मिलने, परिणय सूत्र में बँधने और उनके निरंतर प्रगाढ़ होते प्रेम को दिखाता हुआ फिल्म का ये गीत पार्श्व में चलता रहता है। बाँसुरी के मधुर टुकड़े से ये गीत शुरु होता है जब मुखड़े में सजीव लिखते हैं..
सौंधी सी सुबहों में
कुछ भीगे सपने हैं
सपनों में है कोई अपना सा
कोई जादू हो जैसे
बदला ये जग कैसे
दिल जैसे हो दिल में धड़का सा
मन रे मन रे, पागल मन रे, कैसा तू दीवाना
इसके बाद जो जी वी प्रकाश कुमार की वॉयलिन आधारित धुन है उसे फिल्म में अभिनेत्री साई पल्लवी के इन्ट्रो में भी इस्तेमाल किया गया है और इस गीत के इंटल्यूड्स में।
जी वी प्रकाश कुमार
मैंने पिछले साल के जितने गीतों को सुना उसमें संगीत का ये टुकड़ा मेरे दिल में बस सा गया। बाद में मैंने पाया कि इस धुन की लोकप्रियता का ये आलम है कि इंस्टाग्राम पर हजारों की संख्या में लोग बाग इसी धुन को पार्श्व में रखकर रील बना रहे हैं।प्रकाश पिछले दो दशकों से तमिल और तेलगु फिल्मों के संगीत निर्देशन में सक्रिय रहे हैं और एक बार राष्ट्रीय पुस्कार भी जीत चुके हैं।
ये धरती ये गगन, हैं अपने मिलन के गवाह
दोहराते जायेगें , सदियों सदियों तक ये दास्तां
हम चाहत के माने, दुनिया को सिखाने
फिर लौटेंगे वापस यहां
मन रे मन रे, पागल मन रे, कैसा तू दीवाना
मजे की बात ये है कि इस गीत के दो अंतरे हैं जिसमें एक का इस्तेमाल फिल्म में हुआ है जबकि दूसरे का इ्ंटरनेट पर उपलब्ध आडियो में। फिल्म वर्सन में सजीव की लिखी ये पंक्तियाँ मुझे बेहद प्यारी लगीं
तेरी खुशबू ले पवन, मेरी सांसों को छूकर गई
कोई बदली चाहत की, मन मेरा भिगो कर गई
मैं तुझमें हूं खोया, न जागा न सोया
है मेरा भी कुछ हाल ऐसा
मन रे मन रे, पागल मन रे, कैसा तू दीवाना
इस गीत को गाया है शान के साथ श्वेता अशोक ने। हालांकि मुझे ऍसा लगा कि अगर श्वेता की जगह ये गीत श्रेया की आवाज़ में होता तो क्या ही बात होती। तो आइए सुनते हैं गीत अपने पहले अंतरे के साथ। दूसरे अंतरे के लिए तो आपको फिल्म देखनी होगी
उत्तरी कारो नदी में पदयात्रा Torpa , Jharkhand
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कारो और कोयल ये दो प्यारी नदियां कभी सघन वनों तो कभी कृषि योग्य पठारी
इलाकों के बीच से बहती हुई दक्षिणी झारखंड को सींचती हैं। बरसात में उफनती ये
नदियां...
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