वार्षिक संगीतमाला 2024 को विदा करने का वक़्त आ गया है उस साल के सबसे शानदार गीत के साथ जिसे सुन या देख कर शायद ही किसी शख़्स की आँखें न भीगीं हों। कभी किसी ज़माने में पंजाब के मशहूर कवि शिव कुमार बटालवी ने इसी शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसे गीतकार इरशाद कामिल ने फिल्म अमर सिंह चमकीला में विदाई गीत का मुखड़ा बना लिया और बाकी के अंतरों में जाते हुए व्यक्ति के भावों को ऐसा पकड़ा कि वो हम सबका गीत बन गया।
मुझे ऐसा लगता है कि आख़िरी वक़्त आने पर हम सब बड़े हो जाते हैं। जब जीवन रहा ही नहीं तो उसमें होने वाली ज्यादतियों की शिकायत भी नहीं रह जाती। शारीरिक पीड़ा के इन क्षणों में भी अपने प्रियजनों के सुखद भविष्य की कामना होठों पर चली ही आती है। इरशाद कामिल व्यक्ति की इसी मनोस्थिति का गीत में मार्मिक चित्रण करते हैं। अरिजीत सिंह ने क्या डूब के इस गीत को गाया है जोनिता गांधी के साथ। ये भी कैसा संयोग है कि इस गीत के आने के डेढ़ साल बाद अरिजीत ने बतौर पार्श्व गायक फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।
वैसे शुरुआत में रहमान का इरादा दिलजीत दोसांझ से इस गीत को गवाने का था जो फिल्म में अमर सिंह चमकीला की भूमिका निभा रहे थे। फिर ये ख़्याल उभरा कि कहानी में जब चमकीला मर चुका तो गाना किसी दूसरे की आवाज़ में गवाना चाहिए और फिर अरिजीत का नाम सामने आया। उनका हिस्सा रिकॉर्ड होने के बाद लगा कि मृत्यु तो अमनजोत की भी हुई है तो उसके लिए एक महिला स्वर को भी गीत में होना चाहिए और इस तरह इस गीत का एक अंतरा जोनिता को मिला।
संसार को छोड़ने के पल के बारे में हर इंसान कभी न कभी विचार तो करता ही है। पर रहमान, इरशाद कामिल , इम्तियाज़ अली ने अरिजीत के साथ मिलकर इस विषय को गीत में ढाल कर अजर अमर बना दिया है। दशकों बाद भी इस गीत की भावनाएं अलग अलग परिपेक्ष्य में लोगों के दिल को जरूर झिझोड़ती रहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
चलते इस गीत के इस रूप में आने का वाक़या भी आपको बताता चलूँ। इस गीत के अपने अस्तित्व में आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।
"रात के ढाई बज रहे थे। संगीतकार ए आर रहमान अपने मुंबई वाले स्टूडियो में इम्तियाज़ अली और इरशाद कामिल के साथ बैठे थे। अचानक रहमान ने कहा कि स्टूडियो की सारी लाइट बंद कर देते हैं। बत्तियां तो बुझा दी गईं पर उनके स्थान पर मोमबत्तियों और दीयों को जलाया गया। रहमान अपने पियानो पर अपने उंगलियाँ चलने लगे। मुखड़ा तो पहले ही बन चुका था पर बाकी अंतरों पर काम अगले दो घंटों में हुआ।"
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,अब विदा करो मेरे यारा,
मैंने जाना है उस पार
तुम सभी साफ सही, हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार
झूठ भला क्यूँ बोलोगे तुम,
सब सच कहते हो,
मेरी नहीं है दुनिया जिसमें,
तुम सब रहते हो
साथ तुम्हारे और रहूँ मैं,
मेरा तो मन था,
सच है यहाँ पे जो भी बुरा था,
मेरे कारण था
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार
मेरे सर पे सारी तोहमत तुम धर देना,
मैं तो मैं हूँ रूह भी मेरी पागल कर देना,
तुम खुश रहना, सब कुछ सहना, मुझको आता है,
टूटे तारे का धरती से कैसा नाता है
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यारा,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार
तुम सभी साफ सही (साफ सही) हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर (पाक मगर) पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार...!!!




























